” चोर चमार गांव में फितूर मचा के रखले रहन सं साला…! बरियात से लवटते बटोराहे भेंटा गइलें सं । लाठी डंडा लेले सभे टूट परल ओहनिन पर। अकेले बंदूक लेले हमहीं । तीन गो के गोली मरनी सरवन के। बाकी लोग लाठी डंडा से मारत मारत भहरा देंले । खदेर खदेर के मरले लोग। केतना के कपार फूटल। केतना के हाथ टूटल। खूब बढ़िया से थूरा गइले सं । अब नेवर हो जइहे सं । एगो अउरी चीज देखलS लोग कि ना… मारे में कूरिमियों आ अहिरों एक दू गो रहन सं । उहो साला बहत गंगा में हाथ धो लेंले सं।” हरिया शान बघारत आपन बाप से बतावत रहे।
ओकर बाप राकेश राय कहलें,” आरे… हम त दुआरे प से बइठ के सब देखते रही। सांच पूछ सं त आज हमार मन के बड़ी शांति मिलल। एहनी के चाल चलन देख के खून खउलत रहे । काम करे के पहिलही मजूरी चाहीं सरवन के। ढेर अइठन बढ़ गइल रहे एहनी के। पूरा भूमिहार समाज के माथा ऊंचा क देलS सं । जवन जवन नोकरिहा बा चमरा, ऊ त अउरी आग में मूतले बाड़ें सं । देखल सं , … सरवन के, बरियात जाय खातिर कतना बढ़िया बढ़िया सूट बूट झरले रहन सं । इहे ना जवन बनिहारी कर ता उहो झरले रहन सं । नीच जात होके हइसन पेन्हीहे सं, त हमनी के का पेन्हब जा ? हमनी के सोझा सूट-बूट पेन्ह के चलीहन सं ? हउ हरामी के औलाद चमार होके हमनी के सोझा रथ पर बइठी ? हमनी के देखा देखी करीहें सं ? जोडा घोड़ी वाली नया चमचमात रथ कतना महंगा कइले रहे । ओतना महंगा त हमनियों के ना करी जा। ई हमनी के नीचे नू देखावत बाड़े सं ? एहनी के अतना औकात ? ससुरन के आरक्षण से नोकरी का लाग गइल …? अपना के जज कलटर से ऊपर बूझत बाड़े सं । ई ससुरन के झुग्गी झोपड़ी में रहे के, त महल बना के हमनी के बरोबरी कर ताडे सं । आंख के सोझा बाइक आ कार प चढ़ के पेंह- पेंह हारन बजावत चलीहन सं त कइसे बरदास होई ? ब्रांडेड जूता मोजा पेन्हिहे सं त कतना दिन लोग आंख मूदी आ सही ? पहिले हमनी के देखते जूता चप्पल खोल के हाथ में ले लेत रहन सं। लेहाज करत रहन सं। आ डेरातो रहन सं। जब से सरकार गांवे गांव इस्कूल खोल देलस, पढ़ लिख के सनक गइले सं। पुरनका रीत रेवाज ई सब तुरत जात बाड़े सं। ओहू में सरकार नोकरी देके अउरी सनका देलस एहनी के। अउरी जतियन अभी ठीक बाड़े सं। आजो लेहाज करत बाड़े सं। देख के खटिया प से बइठल बा त खाड हो जात बाड़े सं। ओहनी में अकड़ नइखे । चमरे ढेर टेढ़ बाड़े सं। दू चार गो लाश गिरावल जरूरी रहे। एहनी के टेढई , एही तरी बीच – बीच में छोड़ावे के परी। कुछो होखे बेटा … बाकिर मन खुश कर देल सं । आज खूब चैन से नींन आई । जा… स… कवनो के डेराय के नइखे । जवन होई तवन देखल जाई। का करीहे सं ससुरा ?
ममिला सलतर पलतर पर गइल त थाना आईल। चमरटोली जा के सबके बेयान लेलस पुलिस। केस दर्ज भईल। मीडिया आवे से ममिला बड़ हो गइल रहे। हल्दीपुर सुर्ख़ी में आ गइल । पुलिस दबावे छिपावे ना पवलस। ओह लाशन के पोस्टमार्टम करा के लाश परिजन के सउपल गइल । डेढ़ दर्जन लोग के नाम परल केस में।
ई घटना के भइला महीना लागल रहे। रत्नाकर रिटायर होके आपन गांव हल्दीपुर अइले। विदेशी नस्ल के कुता पलले। संगे उहो आईल। गांव में दू – तल्ला पक्का के मकान। शहरों के पांश इलाका में मकान। बाकिर गांव में रहे के मन बनल। डी० एस०पी० रहन पुलिस विभाग में। दूइ गो बेटा सरकारी नौकरी में बड़ पद पर।
रिटायर आके अभी ठीक से घर में समानों ना सरिअइले रहन। तब ले मोहल्ला के एगो लइकी के अपहरण हो गइल। अभी मडर वाला केस सेराइलो ना रहे। चमार बेरादरी के लइकी इंटर के छात्रा रहे नन्हकी। पढ़ाई में बड़ा होशियार। माई बाबूजी के इकलौता। मजदूरी बनिहारी कके पढ़ावस। ऊ आपन माई बाबूजी से कहे,” पढ़ लिख के हमहूं रत्नाकर चाचा लेखा पुलिस विभाग में अफसर बनब। तोहरा लोग के बनिहारी ना करे देब। देह धज्जा से बरियार आ लामो रहे। बड़ी जीवट किसिम के लइकी रहे नन्हकी। डेरात ना रहे केहू से। कब्बड्डी के बढ़िया खेलाडी। चमरटोली के लोग के जाय आवे के राह भूमिहार मोहल्ला से रहे। नन्हकी पढे जाय आवे त भूमिहार टोला के कुछ नवछटिया लइका उब चाभ बोल सं। इहो डेरात ना रहे , कडा जबाब देत रहे। एगो लइका बिरन राय नन्हकी के पटावे के फेर में रहे। बाकिर कवनो जना के लव ना लागे देवे। एक दिन बिरन राय नन्हकी के हाथ ध लेलस। बिगड़ल औलाद रहले रहे। हाथ छोड़ा के नन्हकी ओकरा के एक तबडाक कस के मरलस त बिरन राय के कान झनझना गइल । ऊ सपनो में ना सोचले रहे कि एगो छोट जात के लइकी ओकरा के तबडाक मार दीं। धमकी देत कहलस,” भोंसड़ी ढेर बनत बाड़े ? तोरा के जल्दीए मजा चिखाईब। बोल के चल गइल । छोट जात के ढेर लइकी भूमिहार आ अहिरान के लइकन से तंग आके इस्कूल गइल छोड़ देले रही सं। ओहनी के बाबूजी माई से शिकाइतो कइला प कवनो फरक ना। उल्टे डांट सुने के परे कि तोहनी के बेटा बेटी के पढला बिना कवन बिगड़ता बा ? सभन के पढ़ा लिखा देब सं त बनिहरिया कवन करी ?
ओह दिन जिला स्तरीय कबड्डी के मैच रहे। हिलसा शहर के कांलेज के मैदान में। नन्हकी के गांव से कोस भर से कमे दूर रहे। नन्हकी के टीम ओह मैच में भाग लेले रहे। नन्हकी खेलल। खेल ख़त्म होत होत मुंहलुकान हो गइल। हिलसा जाय आवे के टेम्पू के साधन। आखिरी टेम्पू खाड रहे। उहां पहुंचल त उहो भर गइल रहे। तनिको जगहा ना। ओही टेम्पू में बिरन राय आ ओकर दू गो संघतिया। नन्हकी बरियार फेरा में। ओकर गांव के बगले के गांव चैनपुर के एगो सहेली। दूनों डेगरगर चल देली सं। नन्हकी लगे छोटकी मोबाइल रहे। घरे फोन से बता देलस कि टेम्पू ना मिलल पैदल आव तानी जा। संगे चैनपुर वाली सहेली रानी बिया। बतिआवत जात रही सं। आधा दूर जाके रानी अपना गांव वाला राह में घूम गइल। नन्हकी आपन गांव के राह। राह सुनसान। थोरही दूर आगे बढ़ल त आदमी के भनक सुनाईल। बिरन राय आपन दूनों संगतियां के साथे टेम्पू से उतर के बीच राह में नन्हकी के फेर बइठल रहे । आवाज से नन्हकी बिरन राय के चिन्ह गइल। उहें थथम गइल । घरे फोन लगइलस । घंटी बाजल बाकिर फोन ना उठल। खतरा भांप के नन्हकी खेत में उतर के लमी ले लेलस। उहो चिन्ह गइल रहन सं नन्हकी के। अन्हार हो गइल रहे। खेत के आर में ठेस लागल गइल नन्हकी के। गिर परल। उहो तीनो पीठिया ठोक दउरलें सं। ओकरा गिर के उठत उठत में तीनो जुम गइले सं। घ लेलें सं नन्हकी के। गमछी से ओकर मुंह बान्ह के उठा लेंले सं।
देरी भइल त ओकर मतारी फोन करे खातिर फोन खोललस त तीन गो मिसकांल रहे नन्हकी के। फोन कइलस त घंटी बाजे, फोन ना उठे। नन्हकी गिरल त मोबाइल ओकर हाथ से छूट के फेंका गइल रहे। ओकर माई घबरा के रोवे लागल। अनहोनी के शंका बढ़े लागल। खोजाहट शुरू भइल । चैनपुर घूमे वाला राह पर तक खोजल लोग। फेर चैनपुर वाली सहेली के घरे जाके पूछल लोग। ऊ बतवलस कि हम त अपना गांव के मोड़ तक संगे ठीक ठाक से अइनी जा। हम अपना गांव के राह ध लेनी। ऊ आपन गांव के। सगरे खोजले लोग थाह पता ना चलल नन्हकी के। ओकर माई बाबूजी के रोअत बिलखत हालत खराब। कुछ लोग गुमशुदगी के रिपोर्ट लिखावे खातिर ओकर माई बाबूजी के लिया के थाना गइले । थानाध्यक्ष मानिक राय रिपोर्ट ना लिखलस। उल्टे गारी देवे लागल। आ कहलस,” तोहनी के अपते नू कइले बाड़ सं। नीच जात होके तोहनी के लइकी पढ़ावला बिना कवन अकाज बा रे…? इहां बड़े बड़े जमींदार के बेटी के कहो बेटा बढ़िया से पढ़त नइखन सं। तोहनी के चल देले बाड़ सं लइकी पढ़ावे ? कवना इयार जोरे भागल के जान त ? छूटा मुहानी रही त भागी ना ? रिपोर्ट का लिखे के बा रे ? ओकर गरमी ठंढा जाई त अपने घरे आ जाई। जा सं इहां से। दोबारा मत अइह सं। ना त तोहनिये के केस कके बंद क देब हाजत में। मने मन थानाध्यक्ष के गरिआवत लवट गइले लोग।
रत्नाकर पूछलें,” रिपोर्ट लिखा गइल नू ?
संगे रघु गइल रहन त बतवले,” ना भईया … रिपोर्ट ना लिखलस दरोगवा हमनिये के गारी देके भगा देलस। ”
ई काहे… ?
कह ता कि नीच जात होके बेटी पढ़ईब सं त भागी ना ?
” अइसे कह ता… ? ई त बेजांय बात बा। एही से नू ओहनी के अपत बढ़ल बा। हाले मडर भइल आ फेर अपहरण । थाना में रिपोर्ट ना होई त कहां होई ? ठीक बा आज रात जादे हो गइल। काल्ह हम चलब साथे। ”
गांव से दूर एगो नवविगहवा हाता में आम अमरूद के बडहन बगइचा । अतना घन कि दिने में रात लेखा लागेला । ओही में एगो छोट कोठरी। नन्हकी के ओही कोठरी में बान्ह के रखले रहन सं। रात सन्नाटा भइल । तीनो ओकरा से बलात्कार करे के उतजोग में लाग गइले सं । ओकर हाथ पीछे मेहे घूमा के बान्हल रहे। ओकरा के चिताने पारे में दिक्कत होत रहे। ओकर हाथ खोल देले सं। एगो ओकर हाथ कस के जंतले रहे। एगो हाता के दुआरी पर पहरेदारी में रहे। बिरन राय आपन पैंट खोल के, नन्हकी के पैंट नीचे सरकावत रहे। तसही नन्हकी बिरन राय के कस के लात मरलस। ऊ फेंका के देवाल से टकरा गईल। ओकरा माथा में जोर से चोट लागल। ऊ ओहिजे बेहोश हो गइल। जवन हाथ जंतले रहे तनी ढीला भइल । ओकर हाथ पर कस के दांत कटलस। ओकर हाथ के मांस सोहदा गइल । नन्हकी के हाथ छोड़ के जोर से चिल्लाईल… बाप रे बाप जान गइल । हाता के दुआरी पर जवन खाड रहे तवन डरे भाग चलल।
नन्हकी चटकवाहे उहां से नव दू एगारह हो गइल। भागत भागत अपना घरे कवाडी पर धड़ाक से मरलस। ओकर मतारी अभी रोअते रहे। कवाडी खोललस त बेटी के देख भर अकवारी धके रोवे लागल। पूरा मोहल्ला जाग गइल आ सभे जुट गइल ।
विहान भइला रनात्कर नन्हकी आ ओकर बाबूजी के लेके थाना पहुंचले। एगो सिपाही इनिका मातहत में काम कइले रहे। देखलस त सलामी ठोकलस आ थानाध्यक्ष से इनिकर परिचय बतवलस। थानाध्यक्ष से रत्नाकर खुदे आपन परिचय देले। आ पूछले,” काल्ह तू जाति सूचक गारी देके एह लोग के भगा देल, अइसन काहे? थाना में रिपोर्ट ना लिखाई,केस ना होई त कहां होई ? इहे ऊ लइकी ह। राते में ओहनी के चंगुल से छूट के भाग आइल। एकर इकबालिया बयान लिख । कवन कवन रहन सं सब बताई। “सब घटना विस्तार से बतवलस। आ कइसे छूट के भागल आ एगो के हाथ में दांत कटले रहे बता देलस।
केस भइल जल्दीए तीनो धरा गइले । एगो हाथ में पट्टी बन्हले रहे। दांत कटला के सबूत ओकर हाथ बतावत रहे।
केस होखे से भूमिहार समाज के लोग के बड़ा नागवार गुजरल। चरचा होखे लागल,” चमरन अब थाना जाय लगले सं। केस करे लगलें सं। ई गांव खातिर नीक नइखे । गांव के मान मरजाद पर सोझे प्रहार बा। आरे… लइका रहन सं गलती करीए देंले सं त सोझे केस कर द ? कवनो बात विचार ना ? ई निम्मन नइखे होत। गांव में मुखिया सरपंच काहे खातिर बाड़े ? नीच जात होके केस करीहें सं त एहनी के मन बढ़ जाई। रोक ना लागी त माथा पर चढ़े लगीहें सं। ससुरा रत्नाकरा आईल बा रिटायर होके, उहे केस करवले बा। अतना दिन से कुछो भइल रहे ? जब से ई आइल बा साला ! सब चमरन के चढ़ा देले बा। ई साला गांव के भाईचारा खतम कर दी, केस मुकदमा करा के। एकरा से एक दिन बढ़िया से बतियावे परी। ”
” रत्नाकरा के गोली मार दी का…? जइसन कह लोग।” हरिया कहलस।
ओकर बाप कहलें,” अतना जल्दी ना रे… । अभी हाले में तीन गो के मरल सं। आ केतना के लाठी डंडा से मारत मारत गाह देल सं। ढेर हंगामा हो जाई। साल छव महीना अहथिर रह सं। ”
रत्नाकर मोहल्ला में घूम घूम के बात करस। जायजा लेस। लोग में कतना बेचैनी बा। जुलुम अतना होत रहे कि जिनिगी एकक दिन जीअल भारी लागे। लोग बतवलें कि तीन दिन काम कइला पर दू दिन के मजूरी मिलत रहे। एक दिन बेगारी में चल जाय। पूरा मजूरी मांगला पर गारी मिले। केहू के मान सम्मान इचिको ना । गुलाम लेखा व्यवहार। भीतरे भीतर छटपटाहट रहे एह जुलुम से उबरे के। माथ झुका के रहब त ठीक। सिर उठवला प सब गति हो जाय। दलित के केहू के बेटी बहिन से छेड़छाड़ आम बात रहे। मन में आक्रोश धधकत रहे। बाकिर विरोध करे के साहस ना। केहू आगे बढ़ के बोले वाला ना। बिलाई के गरदन में घंटी के बान्ही? ई हाल रहे। रत्नाकर समझवलें,” तोहरा लोग के आपसी मतभेद के कारण ई दुर्गति होत बा। एगो पिटात बा त दोसर देखत बा। एही चलते ओहनी के मन बढ़ल बा। जहिया सब लोग एकवट जईब , आ सभे मिल के कवनो अन्याय, जुलुम के खिलाफ आवाज उठाईब त जुलुम करे वाला कतनो बरियार होई सहम जाई। पचास घर के ई मोहल्ला बा। ई कवनो कम नइखे । एगो घर से एकक गो आदमी इकट्ठा हो जाई त ढेर बा। ”
रकटू टहलें,” ई बात ठीक कहत बाड़ भईया । इहे कारणे बा। अब तू आ गइल, जवन कहब तवन करब जा। का हो ठीक बा नू…?
सभे सहमति जतवलस।
सांझ के बइठक भइल । सभे एकवट के रहे के किरिया खइलें । विस्तार से जानकारी लेवे खातिर रत्नाकर पूछलें,” ऊ जवन मारपीट भइल आ मडर भइल,काहे भइल ? कऱे वाला कवन कवन रहन सं ? के के देखले रहे।
रकटू कहलें, ” ए भईया … का कही जा ? अमरेश भईया के बेटा के बरियात परिछाय खातिर निकलल। दुलहा खातिर शहर से खूब बढ़िया आ महंगा रथ कइले रहन , जोड़ा घोड़ी वाला । घोड़ी बग बग उजर रही सं। रथ ओसही सजल रहे। बैंड बाजा बढ़िया कइले रहन। जानते बाड़, अमरेश भइया नोकरिहा। उनुकर बेटा जवना के वियाह रहे। ओकरो हाले में नोकरी लागल हां । खूब खरचा कके बरात सजले रहन। आगे आगे बैंड बाजा। पीछे दुलहा बइठल रथ। रथ पर बइठल त बुझाए कि राजकुमार बइठल बा। देखते बाड़ कतना गोर गार सुभेखगर बा। चलल परिछाय। राकेश राय के दुआर के सोझा रथ पहुंचल। उनुकर दुआर पर जानते बाड़ चार पांच आदमी बइठले रहे ला। रथ पर दुलहा के बइठल देख बमक गइले राकेश राय। ओहिजे रथ रोका गइल । बाजा बंद। सब बरतिहा सज संवर के निकलल रहे। हंगामा क देलस। गरियावे लगले सं, ” ई नीच जात होके हमनी के सोझा रथ पर बइठी ? ई त पुरनिया के बनावल परम्परा के ध्वस्त करत जात बाड़े सं। आज त हद क देले सं। हमनी के देखा देखी आ बरोबरी करिहे सं ? ई त हमनी के नीच देखावे लगले सं। एहनी के मन ढेर बढ़ गइल । इलाज कइल जरूरी बा। रथ पर से उतार देले सं दुलहा के। कहले , ” पैदल जो परिछावे खातिर। । गांव के सिवान के बहरी जाके तब रथ पर बइठिहे। चाहे जवन मन करे करिहे। ।
“बरियात के बात रहे। सब आदमी दांत पीस के रह गइले । कसहूं परिछावन कके बरात निकलल। बाकिर सबके मन तीत हो गइल । हुलस केहू में ना। पता चलल कि ओही रात भूमिहार समाज के बइठक भइल । ओह मे चमरन के सबक सीखावे के निर्णय भइल। बिहान भइला बरात लवट के गांव में घूसे के पहिलही लाठी डंडा लेके टूट परले सं। राकेश राय के बेटा हरिया बंदूक से गोली चलावे लागल। भगदड़ मच गइल । तीन आदमी के गोली लाग गइल । दवरे पर दम तुर देले। ढेर लोग के हाथ टूटल,कपार फूटल। ढेर लोग घवाहिल हो गइले । सबके चिन्हत बानी जा। ”
“ओहनी के सजाय दिआवे के मन बा…? तोहरा लोग के कोर्ट में गोवाही देवे के परी ।”
कुछ लोग के मन में डर बनल रहे। कारण कि मोहल्ला के आधा से जादा लोग के रोजी रोटी बनिहारी आ मजदूरी पर चलत रहे। भूमिहारे के खेत में काम कइला प पेट चले।
रत्नाकर पूछलें,” मडर करे वाला धरइलन सं कि ना ?”
” ना भईया …कहां एको दिन पुलिस आइल गांव में ? सब छूटा घूमत बाड़े सं।” रकटू बतवले।
” एकर मतलब कि थानाध्यक्ष के रोपया उझिल देले होइहे सं। एही चलते पुलिस कुछो नइखे करत ।ना करी कुछो। एह केस के आगे ले जाय के परी।”
रत्नाकर डी०एस०पी० से मिलले, आ कहले,” सर! दुइ महीना हो गइल ई घटना के भइला । एको अपराधी आज ले धरइले सं ना । गरीब आदमी के न्याय ना मिले के चाही ,? ”
डी०एस०पी० आश्वासन देले। जरूर न्याय मिली। जल्दी कारवाई होई।
दस दिन से जादे समय बीत गइल । कुछुओ ना भइल । ममिला जस के तस।
रत्नाकर एक दिन एस०पी० से मिले के मन बनवले। पता चलल कि नया एस०पी० आइल बाड़े। बड़ी तरख बाड़े। रत्नाकर गइले एस०पी० साहेब के कार्यालय में। नाम पता आ काम लिख के परची में भेजलें। थोरही देरी में बुलाहट भइल । कार्यालय में घूसते टेबल पर रखल नाम पट्टी पर उनुकर नाम बलवंत सिंह मीणा लिखल रहे। नाम पढ़ते काम होखे के उम्मीद में आत्मविश्वास से भर गइले रत्नाकर। सलामी ठोकले त ऊ समझ गइले कि ई पुलिस के आदमी हं, पूछ देले कि नोकरी बा कि रिटायर हो गइल ? रत्नाकर सब बतवले आ आपन परिचय देले आ ऊ घटना के विस्तार से बतवलें कि कतना जुलुम, अत्याचार हो रहल बा। अपराधी आजो छूटा घूमत बा। थाना कुछुओ करत नइखे ।
एस० पी० साहेब चिहइले , ” अतना बड़ घटना हो गइल आ अभी ले अपराधी छूटा घूमत बा ? हत्या कके छूटा घूमी ? ई कइसे हो सकेला ? त्वरित कार्रवाई होई।”
ओही रात में छापामारी भइल । सब अपराधी धरा गइले सं। छापामारी भइला आ अपराधी के धरइला से मनुवादी समाज सदमा में। कबो ना सोचले रहे लोग कि घर मे पुलिस घूसी।
रत्नाकर हिलसा कचहरी में जाके वकील से बात कइले । केई गो वकील से बतिअइले केस लड़े खातिर। कवनो वकील ई केस लड़े के तैयार ना। कहे लगले कि इहे दलित फलित के केस लडब जा। कतना पइसा मिली ? जवन मिली उहो कीचिर कीचिर कके। अतना दिन बाउर आ गइल बा। उहो अपने जात के खिलाफ लड़ें के बा। भूखे मर जाइब जा , दलित के केस ना लडब जा।
रत्नाकर बड़ा चिहइले । ई पढ़ल लिखल बुद्धिजीवी वर्ग कहाय के अतना घंटिहा सोच। इहे कहल गइल बा कि ऊंची दुकान, फीकि पकवान। का जाने लोग कइसे कह ता कि देश एकइसवी सदी में बा ? हमनी खातिर त उन्नीसवीं सदी बा। जब एह लोग के ई हाल बा त गांव में अनपढ़, कुपढ से कवन उम्मीद राखल जाव। संविधान निर्माता आज जीअत रहते त का करीत लोग। अंदाज लगावल जा सकत बा।
थोरे परेशान भइले । हार ना मनलें। पता करत करत पांच नम्बर टेबुल पर पहुंचले। ई टेबल अधिवक्ता राजन के रहे। केहू बतवले रहे कि ई दलित हवें। पूरे कचहरी में बढ़िया अधिवक्ता में इनिको गिनती बा। रत्नाकर आपन परिचय देले। गांव घर बतवले। ई वकील साहब के गांव हल्दीपुर से नियरे रहे। रत्नाकर के जवारिये रहन। रत्नाकर पूछलें,” हल्दीपुर कांड के बारे में जानकारी त जरूर होई ? पेपर वोपर में ई घटना छपल रहे। ”
हं… जानकारी त बा। रउवा ओह गांव के बानी, विस्तार से बताई कइसे कइसे ई कांड भइल ? ओह इलाका के जुलुम अत्याचार से अवगत रहन जा। ऊ कहलें,” हमरा बीस साल से वकालत करत हो गइल । आज तक दलित ममिला के केस कबो कचहरी तक ना पहुंचल। चाहे मडर के कांड होखे चाहे बलात्कार के भा अपहरण के। दलित जान के कवनो बड़ से बड़ घटना पंचायते में जबरन सुलह समझौता एकतरफा करा दिआला। ई पहिला केस बा जवन कचहरी तक पहुंचल। इहो राउर जुझारूपन आ निडरता के चलते। ”
राजन कहलें,” फीस के चिन्ता नइखे करे के। गरीब आदमी कहां से फीस दी। आपन समाज के पहिला केस आइल बा। हम जोरदार ढंग से लडब। जी जान लगा देब। खाली कागज पतर के खरचा एक बेर दे दीं। बाकी हम सम्हार लेब। खरचा जमा कके रत्नाकर अहथिर हो गइले।केस के बारे मे जानकारी समय-समय पर लेत रहन।
रत्नाकर रोज सांझ सवेरे आपन कुता लेके टहलस। ई उनुकर आदत में सुमार रहे। राह में राकेश राय के घर दुआर। उहे पंचायत के मुखिया । इनिका दुआर के सोझा से रत्नाकर आवस जास। दुआर के हाता ढेर ऊंच ना रहे । कुर्सी भा चौकी पर बइठला पर राह में जाय आवे वाला सभे लउके । ढेर लोग राहे में से पायलागी मुखिया,जी गोड लागतानी मुखिया जी कहे। गांव भर के इहे मेन राह। कवनो दोसर ना। रत्नाकर के पहिनावा आ कुता के देख राकेश राय जर भूंज जास। आपना मने में कहस,” हमनी के सइयो एकड़ के जोतदार। ओहू में पंचायत के मुखिया । ई हमरा सोझा से जात आव ता। ना पायलगी ना राम सलाम कर ता हमरा के। खेत बधार से जवन मजदूरा हरवाही चरवाही, बनिहारी कके आव ता। ओहनी के प्रणाम कर ता। हमरा के एकदमे ना। ई हरामी के औलाद हमरा के कुछ बूझते नइखे । एह ससुरा के सुअर पाले के त कुता पलले बा। उहो देसी ना विदेशी नसल के। अइसन कुता हमनी जइसन जमींदार के दुआर पर नू शोभी। कबो कबो राकेश राय जानबूझ के रत्नाकर के सोझा आ जास कि पायलगी करी। बाकिर कुछुओ ना। ऊ कगरिया के चल जास। राकेश राय ओरे तकबे ना करस। बड़ी बेइज्जती महसूस करस। ई एक दिन के नइखे । रोज के बात बा। एकर घमंड नेवर करही के परी।
राकेश राय के धन दौलत अफरात रहे। एके बेटा उहो रत्नाकर के प्रयास से मडर केस में जेल में। ई खींस त रहले रहे। मुखिया होखे के घमंडो । एक दिन ठकठेन बेसाहे खातिर रत्नाकर के दुआर पर आके धमकावे लगलें , ” तोर कुता के भूके से रात के नींन हराम हो गइल । कुता के सम्हार के रख। ना त ठीक ना होई। ना त हम ओकर आवाज बंद क देब। ” रत्नाकर आ राकेश राय कबो सहपाठी रहे लोग। ओहू घरी दूनो जना में झगड़ा होखे।
” ए मुखिया हमार घर से तोहार घर अतना दूर बा कि बाघो गरजी त उहां तक आवाज ना जाई। ई त कुते हं। जहां तक नींन के बात बा त हमार कुता के भूके से ना तोहरा बेटा के जेल जाय से नींन नइखे आवत। ”
“तब का हम झूठ बोलत बानी ? हम कह दे तानी , कुता हटा दे, चाहे बेच दें। ना त अइसे ढेर दिन ना चली। हम चेता दे तानी। जहां तक बेटा के जेल जाय के ताना मारे ताडे । मरदे नू जेल जाला। ऊ कतना दिन रही जेल में। फेर आई कवनो के गोली मारी। हम त कतना बेर जेल गइल बानी। का फरक पड़ता ? आजो मुखिया बानी। छूट के आई त अबकी बेरा ऊहे मुखिया बनी । कवन हराई ? कवन खाड होई हमरा खिलाफ ? ”
राकेश राय के बोली सुन के मोहल्ला के ढेर लोग जुट गइलें। पहिले डरे केहू निकलत ना रहे। ना सोझा केहू अकड़ के खाड होत रहे। सबलोग एकवट गइल रहे। रत्नाकर त अपने पुलिस विभाग के आदमी। डर का होला ऊ जानते ना रहन। अगर उरेब बोलते त उरेब सुन के जइतें ।
” जहां तक तोहरा खिलाफ खाड होखे के बा त तोहार चुनौती हमरा मंजूर बा। अबकी बेरा हम खाड होइब चुनाव में। राकेश राय कुछ ना बोललें।
राकेश राय के अतना चलाना रहे कि दूर से देखिये के लोग बइठल बा त खाड हो जात रहे। दलित समाज के लोग उनुका सोझा तन के खाड ना होत रहे। आज पहिला बेरा एगो दलित उनुका सोझा खाड होके जबाब देलस। समय के नजाकत राकेश राय समझत रहन। इहो ऊ समझत रहन एकरे चलते घर में पुलिस घूसल आ बेटा जेल गइल। जबाब सुन के तिरमिरा गइलें । ई देख के मोहल्ला के लोग के हौसला बढ़ल।
मडर आ अपहरण में जेल में जाय से सदमा में रहे मनुवादी लोग । सपनों में ना सोचले रहे इहो दिन देखे के मिली। ई जातिवादी धनपशुअन खातिर इज्जत के सवाल बन गईल रहे। ओहनी के जमानत करावे खातिर हिलसा कचहरी के आधा दर्जन नामी वकील भिडावल गइल रहे।
पीड़ित पक्ष के वकील अकेले राजन । लड़ाई धुआंधार रहे। जब मनुवादी लोग के पता चलल कि चमरन के केस ओहनी के जाते भाई लडता। उनुका टेबल पर जाके कहलें सं,” का वकील साहब… ई चमरन के केस काहे लडत बानी ?”
” काहे जी चमार के केस ना लडे के चाही ? ई लोग खातिर कोर्ट कचहरी, नियम कानून नइखे ? ई लोग आदमी ना ह लोग? उहो मडर केस बा, का चाह तानी जा मडर होत रहो, बलात्कार होत रहो, अपहरण हो जाय ? ई लोग न्याय खातिर केसो ना करे ? कतना दिन लोग जुलुम सही ?”
” ए वकील साहब… ई केस कके हमनी के गांव के भाईचारा खराब क देलन सं। गांव में पंच सरपंच पंचायत काहे खातिर बा? ”
” ई कइसन भाईचारा हं जी… ,? ओहनी के मडर होखो, बेटी बहिन के इज्जतो लुटाय। रोज गारी गलोज सुने परे,आ पीटइबो करे। आ केसो ना कर सं ? जे मडर कर ता, बलात्कार कर ता, बात बात पर मारपीट कर ता ,ओहनी के जानवरो के बरोबर मोल नइखे ऊ भाईचारा बनावत बा ? तोहरा लोग के लइकन के गंदा हरकत, छेड़खानी से तंग आ के केतना लइकी इस्कूल गइल छोड़ देली सं। ई सब भाईचारा में आवे ला ? मडर करे वाला अपहरण करे वाला, छेड़छाड़ करे वाला भाईचारा बनइले बा कि बिगड़ले बा ?” भाईचारा के मतलब आपसी खानपान, संगे उठन – बइठन , बात – विचार, मान- सम्मान होला। ना कि भेदभाव, छुआछूत, ऊंच नीच। सुख दुख में भागीदार बने । अइसन बा गांव में ?
” ए वकील साहब…! ई कइसे होई कि जवन पुरखे पुरनिया के बनावल परम्परा चलत आवता ऊ छोड़ दी जा ? ई त कबो ना होई । ”
” तब का मन बा ? दमन उत्पीड़न मडर बलात्कार करे के एकाधिकार बनल रहो ? ऊ सब लोग सहत रहो । चूं
तक ना करे केहू ? ऊ आदमी ना ह लोग ? अब भुला जाय के परी ऊ पुरनका परम्परा। जमाना बदल रहल बा। देश में संविधान लागू बा। देश संविधान से चली। मनुस्मृति से ना। ”
” ई संविधान का होला… ? ई हमनी के ना जानी जा, ना मानी जा। जवन पहिले से परम्परा चलल आवता ऊहे चली। ”
” तब कचहरी अइला के का जरूरत बा ? ई कचहरी संविधान के देन ह । ई संविधाने नू कचहरी देखा देलस, जेल देखा देलस। ”
” ए वकील साहब ओहनी के केस लड़ के हमनी के माथा पर मूतवाईं मत। ऊ हमनी के कुछो बुझिहे सं ? के मालिक ह, के गउंवा ह ? भले हमनी ओरे से पइसा लेलीं आ केस छोड़ दीं ।जतना मांगब ओतना उझिल देब जा। ”
” हम खाय भर कमा ली ला। तोहरा लोग के रोपया के लालच नइखे हमरा। हम बिकाय वाला ना हईं । हमरा के कीनल मोसकिल ना, नामुमकिन बा। हमरा ई नइखे बुझात कि केस काहे छोड़ दी ? तोहरा लोग के ओर से आधा दर्जन नामी गिरामी वकील खाड होइहें । एने से हम अकेले, तबो काहे डर बनल बा ? कोर्ट फैसला करी। दूध के दूध, पानी के पानी हो जाई । एह में कवन बड़ बात बा? ”
” ए वकील साहब… ! ढेर कथा सुने खातिर नइखी आइल जा हमनी के। बस्स केस से हट जाई। ई रउवा खातिर निम्मन रही। ना त ढेर बिगड़ जाई राउर। ई चेता के जा तानी जा। फेर हमनी के दोष ना। ”
” केस ले लेनी त ना छोडब। तोहरा लोग के जवन बुझाई तवन कर लिह लोग ।”
“इहां से लवट के ऊ सब हल्दीपुर चमरटोली में जाके धमकवले सं, ” जवन गोवाही देवे जाई ओकरा के दिने दुपहरिया काट देब जा। पहिले चेता के जा तानी जा। ”
सांझ के रत्नाकर कतही से अइले त ई सब जानकारी मिलल। विहान भइला कचहरी जाके राजन से भेंट कके गवाहन के धमकावे वाला घटना के विस्तार से जानकारी देलें । गवाहन के सुरक्षा के मांग राजन कइले जज साहेब से। उनुकर मांग मान लिआईल। सुरक्षा देवे खातिर प्रशासन के आदेश भइल । राजन जल्दीए गवाही करा देले। ओने के वकील जमानत खातिर आवेदन कइले रहे लोग । हिलसा कचहरी के सब नामी गिरामी वकील लागल रहन। ऊ लोग निहचिंत रहे कि बड़े बड़े वकील के सोझा एगो चमार टिक पाई ? हवा में सुखल पतई उधिया ला, ओसही इहो उधिया जाई।
जमानत खातिर जहिया बहस रहे, ओह दिन ढेर लोग फूल माला लेके गांव से आइल रहे लोग। ओह छवो वकील के बहस के बाद, राजन के बहस शुरू भइल आपन ज्ञान आ तजुर्बा के भरपूर उपयोग कइले । आपन तर्क के बौछार से सब लोग के चकित कर देले। राजन के तर्क सुन के जज साहब के मंद मंद मुस्कान देख के ओह पार्टी के वकील के चेहरा पर हवाई उड़े लागल। सबके जमानत खारिज हो गइल ।
ओह लोग के अब देह में तितकी लेस देलस। कोर्ट से निकलते राजन संगे ऊ लोग धक्का मुक्की करे लगले। मारपीट के नौबत आ गइल । राजन के आदमी संगे रहे सं सावंग ना लागल।
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- राम यश अविकल
पकडी गैस एजेंसी के दक्षिण
पोस्ट — पकडी, आरा ,भोजपुर बिहार